मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित पत्नी को मिलते हैं ये कानूनी अधिकार, हर स्त्री को जानना है जरूरी - fun offbeat

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Tuesday, 29 December 2020

मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित पत्नी को मिलते हैं ये कानूनी अधिकार, हर स्त्री को जानना है जरूरी

नमस्कार दोस्तों, शादी एक ऐसा रिश्ता है जिसमें दो अजनबी लोग मिलकर एक नई दुनिया बसाते है। शादी के बाद एक स्त्री सुंदर भविष्य के सपने लेकर नए घर में प्रवेश करती है। वैवाहिक जीवन को सुखी बनाने के लिए मां और पत्नी बनकर उसे अपने स्वास्थ्य, शौक, स्वतंत्रता और सपनों का कभी खुद इच्छा तो कभी परिवार के दबाव में आकर त्याग करना पड़ता है। इन सबके बदले स्त्री केवल प्यार और सम्मान चाहती है।
कुछ सौभाग्यशाली स्त्रियां ही होती है जिन्हें विवाह के बाद प्यार और सम्मानित जीवन मिलता है। 
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राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार पिछले ४ वर्षों में दर्ज घरेलू हिंसा के मामलों में 70% की बढ़ोतरी हुई है।
ऐसा तब है जबकि अधिकांश महिलाएं परिवार को बनाए रखने के लिए चुपचाप सब अपमान सहती रहती हैं या फिर अपने अधिकार के प्रति जागरूक ना होने के कारण उचित कदम नहीं उठाती हैं।

सबसे पहले महिलाओं को ये जानना आवश्यक है कि केवल मार पीट या शारीरिक शोषण ही नहीं बल्कि मानसिक शोषण और बुरा बर्ताव भी घरेलू हिंसा की श्रेणी में आता है।
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"हिन्दू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 (i) (ए) के अनुसार मानसिक क्रूरता को भी घरेलू हिंसा की श्रेणी में रखा जाता है जिसके अन्तर्गत खाना न देना, किसी से मिलने न देना, मायके वालों को ताना मारना, दहेज लेना, चेहरे या शारीरिक खामियों को लेकर ताना मारना, शक करना, घरेलू खर्चे उपलब्ध न कराना जैसे तमाम मामले शामिल है।
घरेलू हिंसा क़ानून 2005 के अंतर्गत महिला अपने जिले में तैनात सुरक्षा अधिकारी के पास आईपीसी की धारा 498A के तहत पति और ससुराल वालों के खिलाफ शारीरिक अथवा मानसिक क्रूरता पर आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकती है"

लंबे समय से पति के खराब आचरण के कारण पत्नी में गहरी पीड़ा, निराशा की भावना और आंतरिक कुंठा मानसिक क्रूरता होती है।

मानसिक क्रूरता को परिभाषित करना कठिन है। कई बार शारीरिक क्रूरता तो दिख जाती है, लेकिन मानसिक क्रूरता को बयां नहीं किया जा सकता। शारीरिक क्रूरता शरीर पर निशान छोड़ती है, लेकिन मानसिक क्रूरता के साक्ष्य कैसे बताए जाएं, इसे क्लियर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा कुछ मानक तैयार किए गए है।

सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें बताया है विवाह में मानसिक क्रूरता-

1. अंतरंगता न रखने का एकतरफा फैसला लेना, भले ही शारीरिक रूप से सक्षम है फिर भी बिना कारण बताए ऐसा करना क्रूरता है।

2. पति या पत्नी कोई भी अकेले ही यह फैसला ले कि विवाह के बाद बच्चा पैदा नहीं करना।

3. इतना तनाव कि साथ न रह सके।

4. बोलचाल में अकड़, अक्खड़पन, चिड़चिड़ापन, भेदभाव या उपेक्षा से विवाहित जीवन में एक दूसरे को सहन करना मुश्किल हो जाए।

5. लंबे समय तक नाराजी, निराशा और कुंठा होने को मानसिक क्रूरता मान सकते हैं।

6. लगातार आरोप लगाना,अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करना, प्रताड़ना और मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।

7. बिना एक-दूसरे की अनुमति या जानकारी दिए पति या पत्नी कोई भी स्टरलाइजेशन करा ले, वह क्रूरता की श्रेणी में आता है।

8. सहृदयता को खत्म करते हुए अपनी खुशी के लिए पत्नी पर दबाव बनाना और प्रताड़ित करना मानसिक क्रूरता है।

अदालत में मानसिक क्रूरता कैसे साबित करें?

मौखिक और शारीरिक दुर्व्यवहार, घमंड, असंगत संबंध और वैचारिक अंतर के चलते पति-पत्नी के सम्बन्ध खराब होने पर लिखित रूप में, या ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग सबसे अच्छे सबूत हैं और इसे व्यापक रूप से अदालत द्वारा स्वीकार किया जाता है। आप गवाहों के साथ अपने मामले को और मजबूत कर सकते हैं।

महिलाओं के कानूनी अधिकार

उपरोक्त कारणों और आरोपों के आधार पर महिला अपने पति से तलाक की मांग कर सकती है। तलाक के बाद पति पत्नी का संबंध विच्छेद हो जाता है लेकिन पत्नी के भरण पोषण और सुरक्षित भविष्य के लिए महिला को कुछ कानूनी अधिकार प्राप्त है।

[डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट २००५ के अनुसार]

१. शादीशुदा स्त्रियाँ अपने साथ हो रहे अन्याय व प्रताड़ना को घरेलू हिंसा कानून के अंतर्गत दर्ज कराकर उसी घर में रहने का अधिकार पा सकती हैं जिसमे वे रह रही हैं।

२. इस कानून के अंतर्गत घर का बंटवारा कर महिला को उसी घर में रहने का अधिकार मिल जाता है और उसे प्रताड़ित करने वालों को उससे बात तक करने की इजाजत नहीं दी जाती।

३. महिला की इच्छा के विरूद्ध उसके पैसे, शेयर्स या बैंक अकाउंट का इस्तेमाल किया जा रहा हो तो इस कानून का इस्तेमाल करके वह इसे तुरंत रोक सकती है।

४. बच्चे की कस्टडी और मानसिक/शारीरिक प्रताड़ना का मुआवजा मांगने का भी महिला को पूरा अधिकार है।

५. घरेलू हिंसा में महिलाएं खुद पर हो रहे अत्याचार के लिए सीधे न्यायालय से गुहार लगा सकती है, इसके लिए वकील को लेकर जाना जरुरी नहीं है, अपनी समस्या के निदान के लिए पीड़ित महिला प्रोटेक्शन ऑफिसर और सर्विस प्रोवाइडर में से किसी एक को साथ ले जा सकती है और चाहे तो खुद ही अपना पक्ष रख सकती है।

६. भारतीय दंड संहिता ४९८ के तहत किसी भी महिला से शादी से पहले या बाद में दहेज़ के लिए मांग करना कानूनन अपराध है। अब दोषी को सजा के लिए कोर्ट में लाने या सजा पाने की अवधि बढाकर आजीवन कर दी गई है।

७. भारतीय कानून के अनुसार, गर्भपात कराना अपराध की श्रेणी में आता है, गर्भपात की वजह से यदि महिला के स्वास्थ्य को खतरा हो या महिला को गर्भपात के लिए बाध्य या बहलाया फुसलाया गया हो तो महिला कानूनी दावा कर सकती है।

८. हिन्दू मैरेज एक्ट १९५५ के सेक्शन २७ के तहत पति और पत्नी दोनों की जितनी भी संपत्ति है, उसके बंटवारे की भी मांग पत्नी कर सकती है। इसके अलावा पत्नी के अपने ‘स्त्री-धन’(अर्थात ससुराल या मायके से उपहार स्वरूप मिले सोने और चांदी के आभूषण आदि) पर भी पूरा अधिकार रहता है।

९. यदि पति बच्चे की कस्टडी पाने के लिए कोर्ट में पत्नी से पहले याचिका दायर कर दे तब भी महिला को बच्चे की कस्टडी प्राप्त करने का पूर्ण अधिकार है।

१०. पारिवारिक मामलों में महिला को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जरुरत पड़ने पर उससे पूछताछ के लिए पुलिस को ही उसके घर जाना होगा।

तलाक की याचिका पर शादीशुदा स्त्री हिन्दू मैरेज एक्ट के सेक्शन २४ के तहत गुजाराभत्ता ले सकती है। तलाक लेने के निर्णय के बाद सेक्शन २५ के तहत परमानेंट एलिमनी लेने का भी प्रावधान है। विधवा महिलाएं यदि दूसरी शादी नहीं करती हैं तो वे अपने ससुर से मेंटेनेंस पाने का अधिकार रखती हैं। इतना ही नहीं, यदि पत्नी को मिल रही रकम कम लगती है तो वह पति को अधिक खर्च देने के लिए बाध्य भी कर सकती है। गुजारेभत्ते का प्रावधान एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट में भी है।

क्या कर सकता है पति 

सीआर. पी. सी. के सेक्शन १२५ के अंतर्गत पत्नी को मेंटेनेंस, जो कि भरण-पोषण के लिए आवश्यक है, का अधिकार मिला है।
पति अगर यह साबित कर दे कि वह इतना नहीं कमाता कि खुद का ख्याल रख सके, या पत्नी की अच्छी आमदनी है, या पत्नी ने दूसरी शादी कर ली है, या अन्य पुरुष के साथ उसका संबंध है- तो उसे मेन्टिनेंस नहीं देना होगा। खुद की पत्नी से कम इनकम या पत्नी की पर्याप्त आमदनी का सबूत पेश करने से पति पर इंटरिम मेन्टिनेंस का भी भार नहीं पड़ेगा।

इस आर्टिकल का उद्देश्य उन महिलाओं और पुरुषों को जागरूक करना है जो जाने अंजाने घरेलू हिंसा और मानसिक प्रताड़ना जैसा गंभीर अपराध कर रहे हैं या सेहन कर रहे हैं। भारतीय संविधान में महिलाओं की सुरक्षा और बेहतर भविष्य के लिए ये कानून बनाए गए हैं, इसलिए जब सहनशीलता की हद हो जाए तो बेहतर है कि रिश्ते से बाहर आकर नई शुरुआत की जाए और गलत इंसान को उसके कर्मों की सजा दिलाई जाए।

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