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Tuesday, 17 October 2017

केवल इस दिन विष्णु जी नहीं, गणेश जी के साथ किया जाता है लक्ष्मी पूजन

बचपन से कहानी सुनते आये हैं कि दीवाली के दिन भगवान राम लंका पर विजय प्राप्त कर अयोध्या पहुंचे थे। उस दिन अयोध्‍या को दीपों की कतारों से सजा दिया गया था, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दीवाली के दिन लक्ष्मी पूजन क्यों किया जाता है, और लक्ष्मी पूजन भी श्री विष्णु के साथ नहीं गणेश जी के साथ क्यों किया जाता है?
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विष्णु जी के साथ पूजन क्यों नहीं - 

इसका कारण समुद्र मंथन से जुड़ी एक पौराणिक कथा है। देवताओं और दैत्यों ने मिलकर जब समुद्र मंथन किया तो उसमें से धन्वन्तरि और माता लक्ष्मी सहित 14 रत्न निकले थे। कार्तिक त्रयोदशी के दिन धन्वन्तरि का उद्भव हुआ था, इस दिन को हम धनतेरस के रूप में मनाते हैं, तथा अमावस्या के दिन धन की देवी लक्ष्मी प्रकट हुईं, जैसे ही देवी लक्ष्मी समुद्र से बाहर निकली उन्हें पाने के लिए सभी आतुर थे। सबसे पहले सन्तों ने देवी लक्ष्मी से आग्रह किया कि,"हम सात्विक लोग हैं श्रेष्ठ हैं, कृपया आप हमारे साथ निवास करें।" तो देवी लक्ष्मी ने कहा, "आपको सात्विक अंहकार है, इसलिए मैं आपके पास नहीं आउंगी। अंहकार मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं है।" देवाताओं ने आग्रह किया,"आप इन्द्र देव के नेतृत्व में हमारे लोक में निवास करो।" देवी लक्ष्मी ने कहा,"मैं आपके पास नहीं आ सकती। क्योंकि आप देवता बनते हो पुण्य और दान से, पुण्य और दान करने वालों को लक्ष्मी से प्रेम और मोह नहीं हो सकता।
दैत्यों ने भी लक्ष्मी से अपने साथ आने को कहा पर लक्ष्मी जी ने मना कर दिया। इस प्रकार लक्ष्मी जी अपने लिए श्रेष्ठ वर की तलाश करते हुए बैकुंठ पहुंची जहाँ उन्होंने विष्णु जी को देखा, विष्णु जी उस समय योगनिद्रा में लीन थे। श्रेष्ठ गुणों से युक्त, अहंकार से मुक्त जगत के पालनकर्ता, और सम्पूर्ण जगत की रक्षा करने वाले विष्णु जी को देखकर लक्ष्मी जी ने उन्हें ही पति रूप में पाने की कामना की, और विष्णु जी के योगनिद्रा से जागने की प्रतीक्षा करने लगीं। एक माह के पश्चात् एकादशी के दिन श्री हरी विष्णु जब योगनिद्रा से जगे तो लक्ष्मी जी ने उनसे विवाह करने का आग्रह किया। इस प्रकार विष्णु और लक्ष्मी जी का विवाह संपन्न हुआ। तभी से हर पूजन में विष्णु जी का लक्ष्मी जी के साथ पूजन किया जाता है।
परन्तु कार्तिक अमावस्या अर्थात दीवाली के दिन लक्ष्मी जी अविवाहित थीं। अतः इस दिन उन्हें विष्णु-पत्नी के रूप में न पूजकर केवल धन की देवी के रूप में पूजा जाता है।

गणेश जी के साथ पूजन क्यों - 

इसके दो कारण हैं, पहला कारण है कि श्री गणेश को प्रथम पूज्य देव होने का वरदान प्राप्त है। कोई भी पूजा केवल तभी सम्पूर्ण और सार्थक मानी जाती है, जब गणेश जी की पूजा से प्रारम्भ की जाये। अतः लक्ष्मी पूजन से पहले भी गणेश पूजन किया जाना अनिवार्य है, तभी पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
दूसरा कारण ये है कि देवी लक्ष्मी धन की देवी हैं, और श्री गणेश बुद्धि के देवता हैं। इसलिए लक्ष्मी जी के साथ गणेश का पूजन इस बात को दर्शाता है कि, धन और बुद्धि दोनों का आशीर्वाद एक साथ मिले। क्योंकि बुद्धिहीन व्यक्ति के पास धन आ जाना सुख और समृद्धि का नहीं, कष्ट और पतन का कारण बनता है।
पूजा करते समय लक्ष्मी-गणेश को इस प्रकार स्थापित करें कि लक्ष्मी जी सदा गणेश जी के दाहिने ओर ही रहें, तभी पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होगा। क्योंकि शास्त्रानुसार बायां स्थान पत्नी को ही दिया जाता है।
वेदों के अनुसार भगवान विष्णु के प्रत्येक अवतार में महालक्ष्मी को ही उनकी पत्नी का स्थान मिला है। जहां विष्णु हैं वहीं महालक्ष्मी भी हैं। अगर धन की देवी को प्रसन्न करना है और लक्ष्मी जी के स्थायी निवास की कामना करनी है तो विष्णु जी का आह्वान जरूर करें। क्योंकि जहाँ विष्णु जी होंगे माता लक्ष्मी भी सदैव उस जगह निवास करेंगी।
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