नायब हीरे की असलियत और उसका दुख , एक लघुकथा - fun offbeat

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Tuesday, 12 September 2017

नायब हीरे की असलियत और उसका दुख , एक लघुकथा

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काफी समय पहले की बात है, एक राजमहल में एक स्त्री और उसका देवर काम करते थे। एक दिन राजमहल में उस स्त्री के देवर को एक हीरा मिलता है। वो अपनी भाभी को बताता है। महिला होशियारी से वो हीरा बाहर फेंक कर कहती है ये कांच है हीरा नहीं। वही महिला घर जाते वक्त चुपके से वो हीरा उठाके ले जाती है। वह सुनार के पास जाती है और हीरा दिखाती है।
सुनार समझ जाता है इसको हीरा कहीं मिला होगा। ये पत्थर असली है या नकली इसे नही पता, इसलिए पुछने आ गई। सुनार भी होशियारी से वो हीरा बाहर फेंक कर कहता है ये कांच है हीरा नहीं। महिला लौट जाती है। सुनार वो हीरा चुपके सेे उठाकर जौहरी के पास ले जाता है, जौहरी हीरा पहचान लेता है। नायाब हीरा देखकर उसकी नीयत बदल जाती है। वो भी हीरा बाहर फेंक कर कहता है ये कांच है हीरा नहीं। लेकिन ये क्या, जैसे ही जौहरी हीरा बाहर फेंकता है, उसके टुकडे टुकडे हो जाते हैं।
यह सब एक राहगीर दूर से देख रहा था, वह हीरे के पास जाकर पूछता है, "उस महिला और सुनार ने दो बार तुम्हें फेंका, तब तो तुम नही टूटे, फिर अब कैसे टूट गये?"
हीरा बोला, "महिला और सुनार ने मुझे फेंका क्योंकि वो मेरी असलियत से अनजान थे। लेकिन, जौहरी तो मेरी असलियत जानता था, तब भी उसने मुझे बाहर फेंक दिया, यह दुख मै सहन न कर सका, इसलिए टूट गया।
ऐसा ही हम मनुष्यों के साथ भी होता है, जो लोग आपको जानते हुए भी आपका दिल दुखाते हैं, तो यह बात आप सहन नही कर पाते। इसलिए कभी भी अपने स्वार्थ के लिए अपने आत्मीय जनों का दिल ना तोड़ें।
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