कहीं आप भी इस भीड़ का हिस्सा तो नहीं - fun offbeat

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Thursday, 3 August 2017

कहीं आप भी इस भीड़ का हिस्सा तो नहीं

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क्या आप भी उस भीड़ का एक हिस्सा हैं जो किसी पर कहर बनकर टूट पड़ती है, आव देखते हैं न ताव बस हाथ पैर की खुजली मिटा डाली। पर उस भीड़ का एक भी शख्स ऐसा होता है क्या जिसका खुद का दामन पाक साफ़ हो। खैर जो भी हो, वाकया कुछ यूँ है कि आगरा में लोगों की गुस्साई भीड़ ने बिना कुछ देखे समझे एक बुजु्र्ग महिला का काम तमाम कर दिया। उसे इतना मारा कि मार ही डाला। आरोप चोटी काटने का था। महिलाओं की चोटी काटने का मामला राजस्थान और दिल्ली से होता हुआ यूपी जा पहुंचा है। अब तक दर्जनों औरतों की चोटियां कौन काट गया, पता नहीं। पिछली बार की तरह 'मुँहनोचवा' और 'काला बन्दर' जैसी कोरी अफवाह भी हो सकती है जिसे मीडिया द्वारा काफी बढ़ा चढ़कर पेश किया गया है। आगरा के फतेहाबाद के मुटनई गांव में रात में एक महिला की चोटी कटने से लोग गुस्से में थे, सुबह एक बुजुर्ग महिला मोहल्ले में निकली तो बड़ी से बड़ी जांच एजेंसियों को भी पीछे छोड़ते हुए लोगों की शक की सुई उस पर घूम गई और बिना गवाह और सबूत के उसका फैसला सुना दिया।
महिलाओं की पर्सनालिटी के बारे में जानना है तो उनके सैंडल देखिए 
मृतका के घरवालों की मानें तो वह शौच के लिए निकली थी। लेकिन लोगों ने उसे मार डाला। खैर मामले में पुलिस तफ्तीश कर रही है। भीड़ के लिए यह कोई पहला एक्शन सीक्वेंस नहीं था, इससे पहले भी कई घिसे पिटे एक्शन सीक्वेंस पहले भी देखे जा चुके हैं।
गोकशी ओर गोहत्या को लेकर की गयी हिंसा हो या फिर दादरी के अखलाख की बीफ को लेकर हत्या। कश्मीर में पुलिस अधिकारी की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर की गयी हत्या हो, या फिर ट्रेन में युवक की हत्या, इसके आलावा रोड रेज के कुछ मामले। आए दिन भीड़ के द्वारा अंजाम दी जाने वाली वारदातों का अगर हिसाब लगाया जाए तो लिस्ट कभी ख़तम ही नहीं हो पायेगी। मेरा कहना सिर्फ इतना है कि भीड़ चाहे तो और भी काम कर सकती है जो उनके खुद के और मानवता के भले के लिए हों
जैसे- स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा बनकर गांव, कस्बों और शहरों की सफाई कर दें, शौचालय बनवाने में योगदान देदें, या सीमा पर जाकर उन जवानों की मदद कर दें जो दिन रात चीनी और पाकिस्तानी सेना से लड़ रहे हैं, पवित्र नदियों जैसे गंगा यमुना की सफाई में सरकार का हाथ बंटा दें या कम से कम और गन्दा होने से रोक लें, ट्रैन, बस ,स्कूल कॉलेज में जाने वाली महिलाओं की सुरक्षा के लिए एकजुट हो जाएँ। 
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क्यों ये भीड़ हमेशा फैसला करने ही आती है, कभी मदद के लिए नहीं आती, दुर्घटना में घायल पड़ा कोई व्यक्ति सड़क पर पड़ा पड़ा दम तोड़ देता है तब ये भीड़ कहाँ होती है, वहीँ जब एक्सीडेंट करने वाला पकड़ जाये तो उसकी धुनाई करने के लिए आ जाती है। निर्भया केस जिसे पूरा देश आज तक भूल नहीं पाया है, जब उस लड़की को जरूरत थी अस्पताल पहुंचाने की तब कोई वाशिंदा नहीं रुका मदद के लिए वहीँ जब विरोध प्रदर्शन की बात आयी तब पूरी भीड़ इकट्ठी हो गयी जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए। आशा करती हूँ कि भविष्य में लोग इतने जागरूक बनेंगे जो फैसला कर पायें कि उन्हें किस भीड़ का हिस्सा बनना है।

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