Mahashivratri | गणेश और कार्तिकेय के आलावा शिव जी के तीसरे पुत्र, जिनके बारे में आप नहीं जानते होंगे - fun offbeat

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Friday, 4 August 2017

Mahashivratri | गणेश और कार्तिकेय के आलावा शिव जी के तीसरे पुत्र, जिनके बारे में आप नहीं जानते होंगे

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शिव जी के तीसरे पुत्र 

दैत्यगुरु शुक्राचार्य भृगु महर्षि के पुत्र थे तथा देवगुरु बृहस्पति आचार्य अंगीरस के पुत्र थे। इन दोनों ने बाल्यकाल में कुछ समय तक आचार्य अंगीरस के यहां विद्या प्राप्त की, परन्तु आचार्य अंगीरस बृहस्पति से अधिक प्रसन्न रहते थे जिसके चलते उन्होंने शुक्र के प्रति विद्या सिखाने में कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई। असंतुष्ट होकर शुक्र ने अंगीरस का आश्रम छोड़ दिया और गौतम ऋषि के पास जाकर विद्या प्राप्त करने की प्रार्थना की। गौतम मुनि ने शुक्र को समझाया, "बेटे,इस समस्त जगत् के गुरु केवल शिव ही हैं। इसलिए तुम उनकी आराधना करो। तुम्हें समस्त प्रकार की विद्याएं और गुण स्वत: प्राप्त होंगे।" गौतम मुनि की सलाह पर शुक्र ने गौतमी नदी के तट पर पहुंचकर शिव जी का ध्यान किया। शिव जी ने प्रत्यक्ष प्रकट होकर शुक्र को मृत संजीवनी विद्या का ज्ञान दिया।
शुक्र ने मृत संजीवनी विद्या पाकर देवताओं के विरुद्ध उसका प्रयोग किया, और समस्त मृत राक्षसों को जीवित करना प्रारम्भ कर दिया। जिस कारण दानवों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी।
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देवता चिंतित हो गए। वे युद्ध में दानवों को पराजित नहीं कर पा रहे थे। अंत में निराश होकर सभी देवगण शिव जी की शरण में गए, और कहा, "महादेव! आपकी विद्या का दानव लोग दुरुपयोग कर रहे हैं। शुक्राचार्य मृत संजीवनी विद्या से, मृत दानवों को जीवित कर रहे हैं। यही हालत रही तो अनर्थ हो जायेगा। कृपया आप हमारा उद्धार कीजिए।"

शुक्राचार्य की मृत संजीवनी विद्या 

शुक्राचार्य द्वारा मृत संजीवनी विद्या का इस प्रकार अनुचित कार्य में उपयोग करने से शिव जी क्रोधित हो गए और शुक्राचार्य को मुँह में रखकर निगल लिया। महादेव द्वारा शुक्राचार्य को निगलने के बाद राक्षसों की सेना कमजोर हो गई, और देवताओं की विजय हुई। इधर भगवान शिव के पेट में शुक्राचार्य बाहर आने का रास्ता खोजने लगे। शुक्राचार्य को महादेव के पेट में सातों लोक, ब्रह्मा, नारायण, इंद्र आदि पूरी सृष्टि के दर्शन हुए। इस तरह शुक्राचार्य सौ सालों तक महादेव के पेट में ही रहे। अंत में जब शुक्राचार्य बाहर नहीं निकल सके तो वे शिवजी के पेट में ही मंत्र जाप करने लगे। इन मन्त्रों के प्रभाव से शुक्राचार्य महादेव के अंग से शुक्राणु के रूप बाहर निकले। तब उन्होंने शिवजी को प्रणाम किया। शुक्राचार्य को बाहर निकला देख भगवान शिव ने उनसे कहा कि- चूंकि तुम मेरे शुक्राणु से उत्पन्न हुए हो, इसलिए अब तुम मेरे पुत्र कहलाओगे। महादेव के मुख से ऐसी बात सुनकर शुक्राचार्य ने उनकी स्तुति की। माता पार्वती ने भी शुक्राचार्य को अपना पुत्र मानकर बहुत से वरदान दिए। और तभी से शुक्राचार्य शिव जी के तीसरे पुत्र कहलाये।
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एक अन्य कथा के अनुसार-शुक्राचार्य ने किसी प्रकार छल-कपट से एक बार कुबेर की सारी संपत्ति का अपहरण किया। कुबेर को जब इस बात का पता चला, तब उन्होंने शिव जी से शुक्राचार्य की करनी की शिकायत की। शुक्राचार्य को जब विदित हुआ कि उनके विरुद्ध शिव जी तक शिकायत पहुंच गई, वे डर गए और शिव जी के क्रोध से बचने के लिए झाडि़यों में जा छिपे। आखिर वे इस तरह शिव जी की आंख बचाकर कितने दिन छिप सकते थे। एक बार शिव जी के सामने पड़ गए। शिव स्वभाव से ही रौद्र हैं। शुक्राचार्य को देखते ही शिव जी ने उनको पकड़कर निगल डाला। शिव जी की देह में शुक्राचार्य का दम घुटने लगा। शिव जी का क्रोध शांत नहीं हुआ। उन्होंने रोष में आकर अपने शरीर के सभी द्वार बंद किए। अंत में शुक्राचार्य मूत्रद्वार से बाहर निकल आए। इस कारण शुक्राचार्य पार्वती-परमेश्वर के पुत्र समान हो गए।
शुक्राचार्य को बाहर निकले देख शिव जी का क्रोध पुन: भड़क उठा। वे शुक्राचार्य की कुछ हानि करें, इस बीच पार्वती ने परमेश्वर से निवेदन किया, यह तो हमारे पुत्र समान हो गया है। इसलिए इस पर आप क्रोध मत कीजिए। यह तो दया का पात्र है। पार्वती की अभ्यर्थना पर शिव जी ने शुक्राचार्य को अधिक तेजस्वी बनाया। अब शुक्राचार्य भय से निरापद हो गए थे। उन्होंने प्रियव्रत की पुत्री ऊर्जस्वती के साथ विवाह किया। उनके चार पुत्र हुए-चंड, अमर्क, त्वाष्ट्र और धरात्र।
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